गुरशरण सिंह एक ऐसे रंगकर्मी रहे हैं जिनके नाटक हाशिये पर धकेले जा चुके शोषितों और वंचितों की पीड़ा तथा आक्रोश को वाणी देते हैं, साथ ही अधिकारों की प्राप्ति के लिए संगठित आन्दोलन तथा संघर्ष की अनिवार्यता का आह्वान भी करते हैं । उनके नाटक सामान्य आदमी के लिए हैं, इसलिए वे नाटक को तमाम आडम्बरों और तामझाम से बाहर निकालकर आमजन के बीच ले आए । गुरशरण सिंह के समूचे रंगकर्म की भाषा बेशक पंजाबी रही है, पर उनके नाटकों की अनुगूँज हिन्दुस्तान की सरहद के पार भी सुनाई देती है । नाटक से मामूली लगाव रखने वाला हर व्यक्ति उनके नाम और काम से परिचित है ।
यह पुस्तक गुरशरण सिंह के व्यक्तित्व, उनकी विचारधारा, उनके नाट्य सृजन संसार एवं रंगमंच की समझ के लिए एक विवेकपूर्ण आधार प्रदान करती है ।
| फोटो | नाम और परिचय | अन्य पुस्तकें |
|---|---|---|
![]() |
गुरशरण सिंह | सभी पुस्तकें देखें |
अभी तक कोई रिव्यु नहीं दिया गया है।
रिव्यु देंरिव्यु दें