राजेन्द्रपाल सिंह ‘वारियर’ जी का जीवन मुझे यह सिखाता रहा कि अन्याय के सामने चुप रहना भी एक प्रकार की सहभागिता होती है । जब मेरे जीवन में ऐसे समय आये जहाँ समझौता आसान था और प्रतिरोध कठिन, तब उनके संघर्ष– युवावस्था में कारावास, भय के सामने अडिग रहना और राष्ट्र के लिए निजी जीवन को पीछे रखना, मेरे लिए नैतिक बल बने । मैंने उनसे साहस को नारे की तरह नहीं, बल्कि धैर्य और आत्मसंयम के रूप में सीखा ।
–––स्वतन्त्रता सेनानियों की विरासत केवल स्मारकों या पुस्तकों में नहीं रहती, बल्कि वह पीढ़ियों के भीतर एक आन्तरिक अनुशासन के रूप में प्रवाहित होती है । कठिन परिस्थितियों में सच के पक्ष में खड़े रहने का साहस, अकेले पड़ जाने की स्थिति में भी विवेक से समझौता न करने की क्षमता ये सब ‘वारियर’ जी से विरासत में मिली हुई सीखें हैं ।
–इसी पुस्तक से
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राजेन्द्र पाल सिंह वारियर |
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