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आलस का अधिकार

30 /-  INR
उपलब्धता: स्टॉक में है
भाषा: हिन्दी
आईएसबीएन: 978-93-94061-79-8
पृष्ठ: 40
प्रकाशन तिथि:
प्रकाशक: अन्तरराष्ट्रीय प्रकाशन
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माल के अति–उत्पादन के बावजूद, विनिर्माण में मिलावट के बावजूद, मजदूर अनगिनत संख्या में बाजार में घुसकर गुहार लगाते हैं–– काम दो! काम दो! उनका अत्यधिक बहुतायत उन्हें अपने जुनून पर लगाम लगाने में सहायक होना चाहिए था । इसके विपरीत उन्हें इसका दौरा पड़ता है । काम का मौका मिलते ही वे वहाँ भीड़ लगाते हैं–– फिर वे काम की भूख मिटाने के लिए बारह, चैदह घण्टे काम की माँग करते हैं और अगले दिन उन्हें फिर से सड़क पर फेंक दिया जाता है, जहाँ उनके पास अपनी इस बुरी आदत को मिटाने के लिए कोई काम नहीं होता । हर साल सभी उद्योगों में मौसम बदलने की तरह तालाबन्दी होती है । इसलिये शरीर तोड़ने वाले अत्यधिक काम के बाद आता है दो या चार महीने का पूर्ण आराम और जब काम बन्द हो जाता है तो थोड़ी–बहुत मजदूरी मिलनी भी बन्द हो जाती है । चूँकि काम की बुरी आदत मजदूरों के रूह में शैतान की तरह चिपकी हुई है, चूँकि इसकी आवश्यकताएँ प्रकृति की अन्य सभी प्रवृत्तियों को दबा देती हैं, चूँकि सामाजित रूप से आवश्यक काम की मात्रा माल के उपभोग और कच्चे माल की आपूर्ति से ही तय होती है, इसलिए सालभर के काम को छह महीनों में क्यों निबटाया जाये–– क्यों न उसे बारह महीनों में बराबर बाँट दिया जाये और हर मजदूर को छह महीनों तक दिन में बारह घण्टे काम करने की लालसापूर्ति के बजाय सालभर में रोज छह या पाँच घण्टे से ही सन्तुष्ट रहने के लिए बाध्य किया जाये । एक बार अपने निश्चित दैनिक काम का आश्वासन मिलने पर, मजदूर एक–दूसरे से ईर्ष्या नहीं करेंगे, एक–दूसरे के हाथों से काम और एक–दूसरे के मुँह से निवाला छीनने के लिए नहीं लड़ेंगे और फिर, शारीरिक–मानसिक थकान के बिना, वे फुर्सत का सदाचार अपनाना शुरू कर देंगे ।

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